मैं बिहार का मज़दूर हूँ
नॉर्वे से पीएचडी रिसर्च करने वाले एक बिहारी अभिषेक रंजन भैया जी ने "#बिहारी_मजदूर" के पीड़ा को अपने क़लम से "मैं बिहार का मज़दूर हूँ।" कहकर सच्चाई को बयां किया है, आप भी जरूर पढ़िए।
मैं बिहार का मज़दूर हूँ। हाँ, मैं अमीरों के महल बनाता, सफाई करता, बोरा ढोता , मजदूर होना शायद मेरी फिदरत में ही लिख दिया गया था जब मेरा जन्म बिहार जैसे जगह पे, गरीब परिवार में हुआ था।
मैं बिहार का मजदुर हूँ, ना, मजदूर होना मैं नही चाहता था, लेकिन मैं मजबूर था गरीबी से लड़ने में, परिवार चलाने में, कर्ज चुकाने में, बच्चों को पढ़ाने में और जिंदगी की तमाम चुनौतियों का सामना करने में।
मैं बिहार का मजदूर हूँ। मुझे नेताओं ने लूटा, मेरे नाम की राजनीति करके आज वो खुद आलीशान बंगलों में रहते हैं। लेकिन मैं बस सालों से झोपड़ी में जन्म लिया ,रहा और शायद यहीं मर भी जाऊंगा।
मैं बिहार का ही मजदूर हूँ और मैंने दशकों से जमींदारों की खेत खलिहान जोते, हल चलाये, बैल हांका और एक ग़ुलामी का जीवन बिताया। ये जो शब्द साहेब है न शायद मैंने ही बनाया है अपने हुक्मरानों के लिए।
मैं बिहार का मजदूर हूँ मुझे शिक्षा से वंचित रखा गया, मुझे मेरी जाति के आधार पे तौला गया, नेताओं के वोट बैंक बचे रहे इसलिए ऊपर उठने के साधन नही , अवसर नही, मैं करूँ भी तो क्या करूँ, जिंदगी की जदोजहद ने बस मजदूर बना डाला।
मैं बिहार का मजदूर हूँ, बेबस, मजबूर और लाचार, मेरे आसुओं को न्यूज़ में दिखाकर मीडिया ने खूब तालियां बटोरी, फिल्मकार ने चित्रण करके मेरी अशिक्षा का मज़ाक बनाकर दुनिया मे बिहारियों को बदनाम किया।
मैं बिहार का मज़दूर हूँ , चुनाव के वक़्त ही नेताओं को देख पाता हूँ नोट बाटते और फिर 5 साल बाद ही मुलाकात हो पाती है। मेरा बचपन अपहरण, हत्या, लूट, डकैती, रंगदारी, बलात्कार की खबरों से सनी अखबारों के साथ गुज़रा है।
मैं बिहार का मजदूर हूँ। चाहे वो चमकी बुखार हो या फिर ये अभी कोरोना वायरस , सबसे ज्यादा पीसना मुझे ही क्यों होता है। मेरे अंदर भी एक आत्मा है, मैं भी एक इंसान हूँ। मेरे भी सपने हैं कि बेटा को पढ़ा कर बड़ा साहेब बनाएंगे, बिटिया का बियाह में दहेज में गाड़ी देंगे।
मैं बिहार का मज़दूर हूँ आज भी मेरे सपने में अच्छी सायकिल आती है, कार तो अमीरों के लिए होती होगी, मैंने सपने में भी अच्छे रेस्टोरेंट में जाकर खाने की नही सोची होगी, ऐश आराम शब्द मेरे डिक्शनरी में बने ही नही, फिर भी मैं सबसे शोषित जीवन जीता हूँ।
मैं बिहार का मजदूर ही नही ,भारत जैसे कृषि-प्रधान विकासशील देश की आत्मा हूँ। मुझे भी आत्मसम्मान से जीने का हक है। आज ये मजदूर और मजबूर होना ही है जिसके वजह से हज़ारों किलोमीटर पैदल चलने की भी साहस रखता हूँ कभी सोच कर देखिएगा मेरी नज़र से, खुद को रखियेगा मेरे जगह पर, जब आपको आज के खाने के वक़्त दिमाग मे ये सोचना पड़ रहा हो कि कल का खाना हो पाएगा भी या नहीं तो शायद आपको समझ आये मेरी जिन्दगी। एक बात कहूँ अमीर लोगों , मज़दूर आप भी हो कहीं न कहीं।
#अभिषेक_की_कलम_से...✍️✍️✍️
इसके लेखक अभिषेक रंजन भैया, बिहार के मोतीहारी जिले के मूल निवासी हैं और #नॉर्वे के #अर्क्टिक_यूनिवर्सिटी में PHD रिसर्चर हैं। शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में भी तत्पर रहते हैं।

ये कहानी मेरे अंदर की अंतरात्मा को झिकझोर देती है
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